शनिवार, 18 अप्रैल 2009

me कहा hu

एक मुलाकात हो गयी फ़रिश्ते से अचानक जब me leta था aankhe band किए हुए अपने अतीत me चला गया चलता गया चलता गया ३० वर्ष २५ वर्ष २० वर्ष १५ वर्ष ५ वर्ष ० वर्ष का हुआ और ekdam चला गया ma के गर्भ me और piche मेरे agaman के purv विचार विमर्श चल रहा था उस फ़रिश्ते और मेरे बीच की duniya me जाना है परन्तु शायद me mana कर रहा था नही muze नही जाना है pahle भी me ja कर आया hu और ऊपर से duniya देख रहा hu कुछ भी नही है सिर्फ़ swarth ही swarth नजर आता है to फ़रिश्ते ने कहा नही अब to भारत aazad हो चुका है भारत badal चुका है अब भारत का dusra रूप होगा suchna takneek की क्रांति aachuki होगी पैसा ही पैसा होगा सब trupt hoge सभी aazadi से jiyenge जब insan की jarurate पुरी होने lagegi to कहे का lafda हो सकता है जब तुम pahle इस dunia me गए थे tab की बात और थी अब to और होगी jao हमने tumhara जन्म sthan समय सब कुछ तय कर दिया है केवल तुम्हारी han की देर है ऐसा ही कुछ फ़रिश्ते ने कहा और फिर एक बार मैंने bharosa करना उचित samza परन्तु कुछ डर to मन me था to meine फ़रिश्ते से कहा चलो आपकी बात मान लेते है पर जो तुम कह रहे हो किस विश्वास से tab उसने अपना leptop खोला power point को on किया और presentation देना चालू कर दिया सभी से dur केवल me अकेला और vo presentation इतना decorative था की meine turant हा कर दी की चलो पिछले janma के दुःख भी भूल जायेंगे

मेरा padarpan हुआ इस duniya me आया ma के garbha me darta sahmta पर खुशी खुशी , कुछ दिन बीते दिन bitate गए ahsas to होने लगा की भाई कही न कही gadbad है कुछ देख to नही सकते थे सिर्फ़ mahsus कर सकते थे इस duniya को vahi swarth की bate vohi jhagde अपने apno me ऐसा कुछ mahsus हो रहा था हमने भी sampark किया फ़रिश्ते से की भाई tumhara प्रोजेक्ट देख कर to आने की सोच रहा hu पर कुछ gadbad लग रही है उसने कहा fikra न करो यह सब tumhara vaham है kher अब आने का सोच ही लिया है to चलो इसी uah poh me कब no mah बीत गए पता न चला

निरंतर ...........................................

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

पता न चला

कब सुबह से दोपहर और शाम हो गयी पता न चला
सोची हुई खास जिन्दगी आम हो गयी पता न चला
करना तो चाहते थे बहुत कुछ, परिस्तिथी से समझोता करना पड़ा
लड़े परिस्तिथियों से बहुत, पर हरे हम ही हमसे जमाना लड़ा
इस लडाई में कब हमने मात खा ली पता न चला .......
जब तक है होसला हर न मानेगे हम ये तो ठाना है हमने भी
कही न कही तो जीत होगी हमारी भी ये तो जाना है हमने भी
यह तो ख़बर रखते है हम की हरे हुए है तो क्या खता भला .........
एक मोका तो सभी को मिलता है इतना तो विश्वास है हमें
चाहे वो मौका मौत के एक क्षण पहले मिले हमें
इंतजार है उस मौके का फेला देंगे हम भी जलजला .........

बुधवार, 4 मार्च 2009

इस देश की बात अलग है

जूनागड़। गुजरात के जूनागड़ में एक ऐसा शख्स है जो इलाके में अकेला वोटर है। जिसके लिए चुनाव आयोग ने एक अलग बूथ का इंतजाम किया है।
घने जंगल में बना एक मंदिर उसमें मौजूद एक पुजारी। लेकिन ये कहानी इस पुजारी की नहीं उसके एक अदद वोट की है। आप यकीन करें या न करें मगर ये वोटर अनोखा है। इस वोटर के लिए चुनाव आयोग एक अलग पोलिंग बूथ बनाया है। अलग पोलिंग बूथ इसलिए कि इस इलाके में वो अकेल वोटर हैं। इस घने जंगल में एक ही मतदाता है।
बनेज के जंगल में मौजूद इस मंदिर को शिव बाण गंगा तीर्थ कहते हैं। इस मंदिर के पुजारी भरत गुरदर्शन दास हैं। गुरदर्शन दास की उम्र के 58 साल बीत गए हैं। गुरदर्शन दास सालों से इस मंदिर की सेवा में लगे हैं।
इस बीच इनका वोटर आई कार्ड भी बन गया। वोटर आईडी कार्ड नंबर है GL G 2359875 और मकान नंबर-एक। लेकिन वोटर तो वोटर है उसके लिए पोलिंग बूथ तो बनेगा ही। भारत विविधताओं का देश है और ये हकीकत भी है।
लेकिन गुरूर्दशन दास का मामला तो सबसे अलग है जो ये साबित करने को काफी है कि हमारी डेमोक्रेसी का रंग भी अनोखा है।
इस पुरी ख़बर वाकई मजेदार है और साथ ही हमें गर्व होना चाहिए हमारी लोकतान्त्रिक प्रक्रिया पर या आश्चर्य भी होना चाहिए क्योकि प्रशाशन चाहता तो जितने कर्मचारी जाने वाले है उस बूथ पर जितना खर्चा होना है उससे कई गुना कम खर्च पर वोटर से वोट लिया जा सकता था आपके क्या विचार है

सोमवार, 2 मार्च 2009

वापिस आओगे क्या

कई दिनों के बाद रोने की इच्छा हो रही है पर आंसू आने को तेयार नही है ,
कहते है तुम्हारी आँखों में महफूज हूँ ये दुनिया मजेदार नही है
क्या हँसे हसने पर लगने लगा है डर, हँसेगे तो भी लग जायेगी नजर
हमें तो अपनी नही मालूम पर पुरी दुनिया को है मेरी ख़बर
तारीफ़ करते है दुनिया वाले ये सिर्फ़ स्वार्थ है कोई प्यार नही है
कहते है की मेहनत से किस्मत बदली जा सकती है पर किस्मत ने मेहनत को बदल दिया
मेहनत तो हमने बहुत की पर इसका मजा तो दुनिया वालो ने ले लिया
शायद हमारी किस्मत को हमारी मेहनत स्वीकार नही है
होने लगा है हमें आब शक ऊपर वाले भी की वो मजा ले रहा है हमारा ,
दोड़ और नाच जैसा हम कहे वरना आना पड़ेगा दोबारा

बहुत हो गया है अब पुनः आने का विचार नही है

क्या हम भागना छोड़ दे या भागते रहे ?

आज सुबह सुबह एक जोरदार SMS प्राप्त हुआ की १ से लेकर ९९९ तक "ए" किसी भी स्पेलिंग में नही आता है वही १००० की स्पेलिंग में आ जाता है वाकई मजेदार लगा क्यो की वर्णमाला का पहला अक्षर को लाने नौ सो निन्यानवे तक प्रयास करना पड़ेगा तब जाकर ए अक्षर आएगा घोर आश्चर्य की बात है क्या यही बात हमारे निजी जीवन के काम काज में तो लागु नही होती है हम जिसके पीछे भागते है वो हमें प्राप्त नही होता है जैसे पैसा है न सच ? क्यो की यहाँ तो हमें मालुम है की ९९९ तक की स्पेलिंग में "ए" नही आने वाला है उसके बाद ही आएगा परन्तु हमारे पैसे कमाने के मामले में हम यहाँ धोखा खा जाते है और हमें यहाँ मालुम तो होता नही है की कौनसा प्रयास हमारा अन्तिम प्रयास है उसके बाद हमें सफलता मिलने लगेगी और हम दोड़ते रहते है तब तक जब तक हम मायूस न हो जाए या थक न जाए, हम वही पर रुक जाते है वो हमारा हो सकता है नौ सो निन्यानवे वाला प्रयास हो परन्तु हम हार स्वीकार कर लेते है इसका कोई उपाय नही है क्या ? कोई काम जो हम करते है उसमे हम सहज रूप से हम सफल नही हो पाते वही दूसरा बड़ी आसानी से सफल हो जाता है ऐसा कोई पैमाना नही है जिसमे हमें यह ज्ञात हो जाये की हमारा प्रयास अब अन्तिम चरण में है
ऊपर वाले की माया ही अजब गजब है उसकी पढ़ाई और परीक्षा साथ साथ चलती रहती है आप परीक्षा देते रहो पास हो तो भी सबक है और फ़ैल हो तो भी सबक है ठहराव तो है ही नही ठहर गए तो बिखर गए आख़िर क्यो ? पुनः वही बात आती है की बचपन में हम किसी पहाड़ के ऊपर से घने जंगल को देखते है तो वो कितना खुबसूरत दीखता है और जैसे जैसे उस जंगल में जाते है तो जंगल घाना डरावना उलज़ंन भरा जहा कोई अंत नही लगता है एक समय ऐसा आता है की न तो हम वापस जा सकते है और आगे जाने की इच्छा ही नही होती है आने वाला कल लगता है की और परेशानी वाला होगा और कही सूरज की एक किरण हमें नजर आती है तो हम जोश में भर जाते है और एक कदम और आगे बढ़ते है की फिर दुःख बढ़ जाते है हजारो लाखो की भीड़ में एक्का दुक्का सफल नजर आते है बाकी सब चूहा दौड़ में लगे हुए है जिसका कोई अंत नही है

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009

अन्तिम समय की क्या कहानी है ?

पिछले दो दिनों से सोच रहा हूँ की अच्छाई का अंत कैसा होता है , या कहते है की सत्य परेशां होता है परन्तु पराजित नही तो क्या सत्य की वाकई में जीत होती है ? हम थोड़े पीछे जाते है रामराज की और रावन ने बहुत पाप किए न जाने कितने को सताया और आख़िर में जंग में भगवन के हाथो मृत्यु को प्राप्त हुआ माँ सीता को अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा तो राम स्वयम को वनवास भोगना पड़ा और पत्नी से विरह भुगतना पड़ा, हम आते है द्वापर युग में वहा भी यही कहानी है कंस ने कितने ही पाप किए परन्तु मुक्ति प्रभु के हाथो तुंरत मिल गयी कोई pareshani नही हुई, कृष्ण को भी कम परेशानी नही हुई वाही प्रभु इशु को क्रॉस नसीब हुआ किसी भी महान व्यक्तिव की चर्चा करे उसका अंत या जीवन परेशानी वाला होता है वाही किसी भी बुरे आदमी का अंत तुंरत हो जाता है चाहे आज भी खतरनाक अपराधी का एनकाउंटर हो जाता है बेचारा सीधा प्राणी रोज रोज मरता है में फिर कहरहा हु की मेरा ज्ञान काफी कम है परन्तु जेहन में कोई सवाल आता है तो लिख लेना उचित समजता हूँ और कुछ सवाल छोड़ने की कोशिश करता हूँ
क्या हम यह कह दे सत्य परेशां हो सकता है परन्तु पराजीत नही लेकिन रोज रोज अपने आप को मारता रहता है

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

सुबह होती है शाम होती है जिन्दगी यु ही तमाम होती है

आगे से ......
कुल मिलकर ये जिन्दगी बहुत ही कठिन निरंतर जा रही है पल पल हमें जीना है तो हर वक्त को एन्जॉय करना होगा
हम अपनी जिन्दगी के मालिक नही रहे अपने व्यापार व्यवसाय नोकरी धंदे में इतने सिमट चुके है की हमेशा डर डर कर जी रहे है नोकरी वाले अपने बॉस से डर रहे है व्यापार वाले अपने ग्राहक से डर रहे है प्रोफेसनल अपने प्रोफेशन से डरते है की में नही तो मेरा काम नही आखिर क्यो ? क्या हम इसी के लिए पैदा हुए है जिसकी बात मानना चाहिए उसकी बात नही मान रहे है और जिसके कई विकल्प है वहा हम डर रहे है मेरे कहने का तात्पर्य है अपने माँ बाप भाई बीवी बच्चे इनकी नही सुनते और बॉस की सुनना पड़ती है ग्राहक से बड़ी विनम्रता से बात करते है क्योकि वो चला गया तो और बीवी से? (अगर वो चली गयी तो ) ये तो हमारे संस्कार इतने अच्छे है की ऐसा नही होता पर शायद कही गड़बड़ है इन संस्कारो में, विदेशो में इसी डर से परिवार के साथ एन्जॉय तो होता है
निरंतर .............